रामायण में कुछ ऐसे पात्र हैं जो सरसरी तौर पर बहुत सामान्य लग सकते हैं पर गंभीरता पूर्वक उनके चरित्र का आंकलन करने पर उनका चरित्र असाधारण लगता है । ऐसे ही एक पात्र हैं केवट । जानकारी के अनुसार केवट मूलतः भोईवंश के माने जाते हैं और उनका मूल पेशा मल्लाह का काम करना रहा है । गंगा नदी के तट पर आए लोगों को अपनी नाव में बिठाकर नदी के इस पार से उस पार ले जाना और उस पार से इस पार ले आना उनका मुख्य काम था । इसी काम ने एक दिन केवट को जीवन का वह अद्वितीय अवसर दिया जिसे पाने के लिए आदमी अपनी उम्र तो खपा देता है फिर भी वह अवसर उसे नसीब नहीं होता।
केवट रामायण का ऐसा भाग्यशाली पात्र है, जिसने मल्लाह का काम करते हुए प्रभु श्रीराम को उनके वनवास के दौरान माता सीता और लक्ष्मण के साथ अपनी नाव में बिठा कर गंगा पार करवाया था।
आज के सन्दर्भ में इस प्रसंग की चर्चा के बहाने हम अगर गम्भीरता पूर्वक सोचें, विचार करें तो यह घटना दर्शाती है कि मनुष्य का छोटा से छोटा काम भी उसे ईश्वर तक पहुंचा सकता है ।
आज ज्यादातर बिषयी लोग छोटे-बड़े कामों को लेकर बहुत टीका टिप्पणी करते रहते हैं, छोटे कामों को हेय की नज़र से देखना , उसका उपहास उड़ाना लोगों की आदत में शामिल होता है।
ऐसे में केवट की भूमिका को उन्हें याद करना चाहिए । यह भक्त केवट ही है जिसने अपनी नाव में बिठाने से पहले साक्षात भगवान राम से अपनी मर्जी के अनुरूप वह सब करवाया जो साधारण मनुष्य के वश में नहीं होता । भगवान अपने भक्त की मंशा भांप लेते हैं और खुशी-खुशी वह सब करते हैं जो उनका भक्त चाहता है।
केवट का वर्णन रामायण के अयोध्याकांड में किया गया है।
भगवान राम केवट को आवाज देते हैं- नाव किनारे ले आओ, पार जाना है।
मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार
मरमु मैं जाना॥
चरन कमल रज कहुं सबु कहई। मानुष करनि
मूरि कछु अहई॥
श्री राम ने केवट
से नाव मांगी, पर वह लाता नहीं है। वह कहने लगा- मैंने आपका मर्म जान लिया। आपके चरण कमलों की धूल के
सम्बन्ध में सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देने वाली कोई जड़ी है। केवट भगवान
से कहता है कि पहले आप पांव धुलवाओ,
फिर नाव पर चढ़ाऊंगा।
केवट प्रभु श्री राम का अनन्य भक्त था। अयोध्या के राजकुमार भगवान राम, केवट जैसे सामान्य व्यक्ति का निहोरा कर रहे हैं। देखा जाए तो समाज की व्यवस्था की नज़र में यह एक अद्भुत घटना है। केवट चाहता है कि वह अयोध्या के राजकुमार को छुए। उन्हें स्पर्श कर उनका सान्निध्य प्राप्त करे । उनके साथ नाव में बैठकर अपना खोया हुआ सामाजिक अधिकार वह दोबारा प्राप्त करे। अपने मनुष्य जीवन की मजूरी का फल वह पा जाए। यहाँ मनुष्य जीवन की मजूरी का अर्थ जीवन की मुक्ति से है जो ईश्वर कृपा के बिना संभव नहीं।
राम वह सब करते हैं, जैसा केवट चाहता है। भगवान राम उसकी इच्छा तथा उसके श्रम को पूरा मान-सम्मान देते हैं। इस तरह राम कृपा से केवट राम राज्य का प्रथम नागरिक बन जाता है।केवट यहाँ लोभ लालच से परे है , वह नाव उतराई लेने से यह कहकर मना कर देता है कि समय आने पर वह मांग लेगा । भगवान का भक्त बहुत दूरदर्शी होता है,उसका ध्येय हमेशा मोक्ष प्राप्ति पर केन्द्रित होता है । केवट को पता है कि ये केवल राम नहीं बल्कि साक्षात भगवान राम हैं, ऐसे में नाव उतराई का मूल्य लेकर अपने मोक्ष प्राप्ति का मार्ग वह अवरुद्ध नहीं कर सकता । हमें भी यह समझना होगा कि कई कार्य जीवन में सेवा कार्य के रूप में होते हैं , जिनका मूल्य नहीं लिया जाता।
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| केवट द्वारा गंगा तट पर भगवान राम का पद प्रच्छालन |
राम त्रेता युग की संपूर्ण समाज व्यवस्था के केंद्र में रहे हैं, इसे सिद्ध करने की जरूरत नहीं है। इस प्रसंग में राम, केवट पर अपनी कृपा बरसा कर उसके स्थान को समाज में ऊंचा करते हैं। केवट द्वारा अपनी नाव में बिठा कर नदी पार कराना साधारण जन को यहाँ भले ही एक छोटा सा काम लगे, पर राम अपनी संघर्ष और विजय यात्रा में एक तरह से केवट के योगदान को बड़ा मानते हैं और लोगों की नज़र में उसे स्थापित करते हैं, उसको बड़प्पन देते हैं। समाज के लिए यह एक बहुत बड़ा सन्देश है । सोचिए कि अगर वहां केवट न होता तो राम को नदी कौन पार कराता ? हमारे जीवन में भी ऐसे छोटे कहे जाने वाले लोगों की बड़ी भूमिका है पर हम उसे नज़र अंदाज करते हैं । केवट प्रसंग हमें यह सिखाता है कि हमारे अपने जीवन में संलग्न इन छोटे कहे जाने वाले लोगों को हम अपनापन दें, उनका सम्मान करें ।
- प्रतिमा शर्मा

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